पत्रकारिता खत्म, अब बस रस्में निभाई जा रही हैं! -

पत्रकारिता खत्म, अब बस रस्में निभाई जा रही हैं!

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आज इंटरव्यू पत्रकारिता का एक ऐसा चेहरा बन चुका है जो केवल दिखावे के लिए ज़िंदा है। जिस दौर में इंटरव्यू किसी नेता, विचारक या समाजसेवी की जवाबदेही तय करने का माध्यम हुआ करता था, वही इंटरव्यू अब एक इवेंट की तरह पेश किया जाता है। न तैयारी होती है, न गंभीरता और न ही कोई ऐसा सवाल जो सचमुच जनता की ओर से पूछा जाए।

नेता एक स्टूडियो में आते हैं, कुछ रटा-रटाया बोलते हैं, पत्रकार मुस्कुराता है, कैमरा कट होता है — और सोशल मीडिया पर हेडलाइन बन जाती है: “XYZ का EXCLUSIVE इंटरव्यू!” असल में यह एक्सक्लूसिव कम और स्क्रिप्टेड ज़्यादा होता है। यह हालत तब और खराब हो जाती है जब जनता को यकीन दिलाने की कोशिश की जाती है कि यही असली पत्रकारिता है।


1. इंटरव्यू नहीं, स्क्रिप्टेड शो

आज हालात ये हैं कि इंटरव्यू को मॉल में शर्ट खरीदने जितना आसान समझ लिया गया है। “आप अभी आइए, 10 मिनट में दो सवाल पूछिए, फिर हम इसे ब्रेकिंग न्यूज़ बना देंगे।” इंटरव्यू की इस ‘फास्ट फूड’ पत्रकारिता ने उस गंभीरता को खत्म कर दिया है जिसकी कभी ज़रूरत थी। अब पत्रकार वही चुनते हैं जो सुविधाजनक हो, और जिनके सवाल पहले से तय होते हैं। असहमति रखने वाले या चुनौतीपूर्ण सवाल पूछने वाले पत्रकारों को दरकिनार कर दिया जाता है।


2. पत्रकारिता का गिरता ढांचा

इंटरव्यू की यह गिरावट उसी सिलसिले की अगली कड़ी है जिसमें पहले रिपोर्टिंग की हत्या की गई, फिर ऐंकरिंग को नारेबाज़ी बना दिया गया, और अब इंटरव्यू को भी एक रस्म बना दिया गया है। डिबेट पहले ही एक तमाशा बन चुकी है, जहां चिल्ला-चिल्लाकर दर्शकों को भ्रम में रखा जाता है कि “बहस हो रही है।” अब इंटरव्यू के ज़रिए यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि “सवाल पूछे जा रहे हैं।”

असल में सवाल अब नेता खुद तय करते हैं। पत्रकार कौन होगा, क्या पूछेगा, कहां तक पूछेगा — सबकुछ कंट्रोल्ड है। जनता को बस एक स्क्रिप्टेड सवाल-जवाब दिखाया जाता है। ना रिपोर्टिंग है, ना जांच-पड़ताल, और ना ही सच्चाई जानने की कोशिश।


3. चुप्पी भी एक बयान है

ऐसे में जब कोई पत्रकार यह कहता है कि “मैं इंटरव्यू नहीं कर रहा,” तो वह केवल इनकार नहीं कर रहा, वह उस पूरे ढांचे पर सवाल उठा रहा है जो पत्रकारिता की जगह मनोरंजन या प्रोपेगेंडा में बदल चुका है।

हर पत्रकार को यह तय करना होगा कि वह इस खेल में हिस्सा ले या इससे बाहर निकले। जब सूचनाओं का संग्रह ही बंद हो गया हो, जब सवाल सिर्फ विपक्ष से पूछे जाते हों और सरकार को मंच मिल रहा हो इंटरव्यू के नाम पर व्यायाम करने का — तो फिर पत्रकार को भी सोचने की ज़रूरत है कि वो कर क्या रहा है।

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